Description
मान्यवर कांशीराम और बौद्ध धम्म लेखक सतनाम सिंह की एक अत्यंत विचारणीय और प्रासंगिक पुस्तक है। इस पुस्तक में लेखक ने बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम के वैचारिक धरातल, बाबासाहेब आंबेडकर के बौद्ध धम्म के प्रति दृष्टिकोण और कांशीराम जी की धार्मिक/वैचारिक रणनीति का सूक्ष्म विश्लेषण किया है।
पुस्तक में कांशीराम जी के इस विचार को प्रमुखता से उभारा गया है कि बिना राजनीतिक रूप से सशक्त हुए या संगठित हुए धार्मिक परिवर्तन समाज को वह मजबूती नहीं दे सकता जिसकी उसे आवश्यकता है। कांशीराम जी का मानना था कि बौद्ध धम्म को अपनाना केवल एक व्यक्तिगत अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति का हिस्सा है।
डॉ. आंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बहुजन समाज को सांस्कृतिक मुक्ति का मार्ग दिखाया था। लेखक सतनाम सिंह ने इस पुस्तक में स्पष्ट किया है कि कांशीराम जी ने किस तरह बाबासाहेब के उसी सांस्कृतिक और धम्म मिशन को जन-जन तक पहुँचाने की योजना बनाई थी।
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कांशीराम जी धम्म परिवर्तन (धम्म दीक्षा) को एक सही समय और सही सामाजिक-राजनीतिक चेतना के साथ लागू करना चाहते थे, ताकि समाज केवल नाम का बौद्ध न बने, बल्कि बुद्ध के प्रज्ञा, शील और करुणा के मूल्यों को आत्मसात कर एक जागरूक और मजबूत समाज के रूप में उभरे।






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